वाशिंगटन/नई दिल्ली: पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल के दौरान भारत पर लगाए गए टैरिफ (आयात शुल्क) का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। हालाँकि ट्रम्प प्रशासन जा चुका है, लेकिन उनके द्वारा लगाए गए कई टैरिफ अभी भी द्विपक्षीय व्यापार संबंधों में एक तनावपूर्ण बिंदु बने हुए हैं। यह न केवल भारतीय निर्यातकों के लिए चिंता का विषय है, बल्कि अमेरिका के साथ भारत के समग्र आर्थिक संबंधों पर भी इसका प्रभाव देखा जा रहा है।
ट्रम्प प्रशासन ने “अमेरिका फर्स्ट” की नीति के तहत कई देशों पर टैरिफ बढ़ाए थे, और भारत भी इसका अपवाद नहीं था। स्टील और एल्युमीनियम जैसे उत्पादों पर लगाए गए ऊंचे शुल्क ने भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल बना दिया था। इसके जवाब में, भारत ने भी कुछ अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी शुल्क लगाए थे, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक विवाद गहरा गया था।
इन टैरिफों का सीधा असर भारतीय उद्योगों पर पड़ा है, जिनमें इन उत्पादों का निर्यात एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। साथ ही, इन शुल्कों ने अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए भी कुछ भारतीय सामानों को महंगा बना दिया। यह स्थिति दोनों देशों के बीच व्यापार घाटे को कम करने के ट्रम्प प्रशासन के घोषित लक्ष्य के अनुरूप थी, लेकिन इसने व्यापार के सुचारू प्रवाह में बाधा डाली।
वर्तमान बाइडेन प्रशासन ने जहाँ कुछ नीतियों को बदला है, वहीं ट्रम्प-काल के टैरिफ को लेकर उसका रुख स्पष्ट नहीं है। हालाँकि, भारत लगातार इन टैरिफों को हटाने या कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। यह मुद्दा भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न केवल आर्थिक लाभ से जुड़ा है, बल्कि वैश्विक मंच पर देश की व्यापारिक साख को भी प्रभावित करता है।
विश्लेषकों का मानना है कि जब तक इन टैरिफों का समाधान नहीं निकलता, तब तक भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में पूर्ण सुधार की उम्मीद करना कठिन है। दोनों देशों को आपसी हितों को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित समाधान खोजना होगा, ताकि द्विपक्षीय व्यापार एक नए और मजबूत स्तर पर पहुँच सके।