एक ट्रेन के डिब्बे में अचानक अफरा-तफरी मच गई। सफर सामान्य चल रहा था, लोग अपनी-अपनी सीटों पर बैठे थे—कोई मोबाइल देख रहा था, कोई खिड़की से बाहर झांक रहा था, कोई ऊंघ रहा था। तभी एक बुज़ुर्ग मुसलमान अंकल की तबीयत अचानक बिगड़ गई। चेहरे पर पसीना, सांस तेज़, हाथ कांपने लगे। आसपास बैठे लोग घबरा गए, कोई समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। ट्रेन अपनी रफ्तार से दौड़ रही थी, लेकिन उस डिब्बे में समय जैसे थम सा गया।इसी भीड़ में एक हिंदू बहन उठी। न उसने यह देखा कि सामने वाला कौन है, न यह सोचा कि वह किस धर्म का है। उसने बस एक इंसान को तकलीफ़ में देखा। वह तुरंत बुज़ुर्ग अंकल के पास पहुंची, उनका हाथ थाम लिया और कहा, “घबराइए मत अंकल, सब ठीक हो जाएगा।” उस एक स्पर्श में डर कम होने लगा। किसी बेटी जैसा भरोसा, किसी अपने जैसा अपनापन। उस बहन ने आसपास के यात्रियों से पानी मांगा, किसी से डॉक्टर होने के बारे में पूछा, किसी को टीटी को बुलाने के लिए कहा। कोई जाति नहीं, कोई मज़हब नहीं—सिर्फ मदद। बुज़ुर्ग अंकल की आंखों में डर था, लेकिन उस हाथ को पकड़ते ही आंखों में सुकून भी आ गया। शायद उन्हें लगा कि वे अकेले नहीं हैं।

कुछ देर में ट्रेन स्टाफ पहुंचा, प्राथमिक इलाज हुआ, अगले स्टेशन पर मेडिकल मदद भी मिल गई। लेकिन जो चीज़ सबसे ज़्यादा दिल को छू गई, वह थी वह इंसानी रिश्ता, जो कुछ मिनटों में बन गया था। न टोपी देखी गई, न तिलक, न नाम पूछा गया—बस तकलीफ़ देखी गई और इंसान ने इंसान का साथ दिया। आज जब हर रोज़ हमें नफ़रत की खबरें दिखाई जाती हैं, जब धर्म, जाति और पहचान के नाम पर दीवारें खड़ी की जाती हैं, ऐसे छोटे-छोटे लम्हे बहुत बड़ा संदेश दे जाते हैं। यह घटना बताती है कि असली भारत टीवी डिबेट्स में नहीं, सोशल मीडिया की ज़हर भरी पोस्ट्स में नहीं, बल्कि ऐसे साधारण लोगों के दिलों में बसता है भारत वह देश है जहां ट्रेन के एक डिब्बे में अनजान लोग परिवार बन जाते हैं। जहां किसी की तकलीफ़ देखकर हाथ अपने आप आगे बढ़ जाता है। जहां इंसानियत, धर्म से बड़ी हो जाती है। उस हिंदू बहन ने कोई भाषण नहीं दिया, कोई नारा नहीं लगाया—उसने बस मदद की। और शायद यही सबसे बड़ा जवाब है उन लोगों के लिए जो कहते हैं कि समाज बंट चुका है जब ट्रेन आगे बढ़ गई, बुज़ुर्ग अंकल की तबीयत संभल चुकी थी। उन्होंने कमजोर आवाज़ में शुक्रिया कहा, आंखें भर आईं। वह बहन मुस्कुरा दी, जैसे यह कोई खास बात ही न हो। शायद उसके लिए यह सामान्य था—क्योंकि इंसान होना सामान्य होना चाहिए। नफ़रतों के इस दौर में, ऐसी घटनाएं हमें याद दिलाती हैं कि आज भी इंसानियत ज़िंदा है। और जब तक ऐसे हाथ थामने वाले लोग मौजूद हैं, तब तक भारत सिर्फ एक देश नहीं, एक भावना बना रहेगा।