लखनऊ: उत्तर प्रदेश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव का दौर जारी है। जहां एक ओर वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी का असर देश भर में दिख रहा है, वहीं राज्य में स्थानीय करों और डीलर कमीशन के कारण उपभोक्ताओं को राहत की उम्मीद कम ही है। यह स्थिति आम आदमी के दैनिक जीवन और आर्थिक गतिविधियों पर सीधा प्रभाव डाल रही है।
पिछले कुछ समय से, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की तुलना में उत्तर प्रदेश के कई शहरों में पेट्रोल और डीजल के दाम थोड़े अधिक देखे गए हैं। हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर दैनिक मूल्य संशोधन प्रणाली लागू है, जिसके तहत हर सुबह तेल कंपनियों द्वारा पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बदलाव किया जाता है। यह बदलाव अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतों, डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर और घरेलू स्तर पर उत्पाद शुल्क (Excise Duty) जैसे कारकों पर निर्भर करता है।
राज्य सरकार द्वारा लगाए जाने वाले वैट (VAT) की दरें भी कीमतों को प्रभावित करती हैं। विभिन्न राज्यों की वैट दरों में भिन्नता के कारण ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अंतर आता है। उत्तर प्रदेश में, वैट की दरें सीधे तौर पर खुदरा मूल्य पर अतिरिक्त बोझ डालती हैं, जिससे उपभोक्ता इस महंगाई से परेशान हैं।
ईंधन की बढ़ती कीमतें सीधे तौर पर परिवहन लागत को बढ़ाती हैं, जिसका असर खाद्य पदार्थों, सब्जियों और अन्य आवश्यक वस्तुओं के खुदरा दामों पर भी पड़ता है। किसानों के लिए बीज, खाद और कीटनाशकों के परिवहन की लागत बढ़ने से कृषि उत्पादन की लागत भी बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक परिवहन और निजी वाहनों पर चलने वाले लोगों के लिए यात्रा का खर्च बढ़ना एक बड़ी चिंता का विषय है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक केंद्र सरकार द्वारा उत्पाद शुल्क में कटौती और राज्य सरकार द्वारा वैट दरों में कमी नहीं की जाती, तब तक उत्तर प्रदेश में उपभोक्ताओं को ईंधन की कीमतों से बड़ी राहत मिलने की उम्मीद कम है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले दिनों में सरकार इस मुद्दे पर क्या कदम उठाती है और आम आदमी को इस मूल्य वृद्धि के बोझ से कब निजात मिलती है।